छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख लोकपर्व है, जो दान, सामाजिक समरसता और नई फसल के उत्सव का प्रतीक है। यह पर्व प्रतिवर्ष पौष माह की पूर्णिमा (पौष पुन्नी) को मनाया जाता है।
ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
मां शाकंभरी और अन्नपूर्णा: यह पर्व पौराणिक रूप से माता शाकंभरी (अन्नपूर्णा का रूप) की पूजा से जुड़ा है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माता अन्नपूर्णा से समस्त सृष्टि के कल्याण हेतु भिक्षा मांगी थी।
फसल उत्सव: ऐतिहासिक रूप से यह कृषि आधारित पर्व है। इस समय तक किसान खेतों से धान की फसल काटकर खलिहानों से घरों में ले आते हैं। फसल घर आने की खुशी में किसान अपनी उपज का एक हिस्सा दान करते हैं।
सत्ययुग की परंपरा: बस्तर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में इसे ‘सत्ययुग की संस्कृति’ माना जाता है, जहाँ ऊंच-नीच के भेदभाव के बिना एक-दूसरे से दान मांगना सम्मान की बात मानी जाती है।
परंपराएं और सांस्कृतिक पहलू
छेरछेरा मांगना: बच्चे और युवा टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं और पारंपरिक गीत गाते हैं: “अरन बरन कोदो तरन, जब्भे डेबे तब्भे टरन, छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा”।
अन्नदान: लोग उदारतापूर्वक धान, चावल, सब्जियां या पैसे दान करते हैं। मान्यता है कि इस दिन दान करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और अहंकार का नाश होता है।
नृत्य: इस अवसर पर ग्रामीण क्षेत्रों में डंडा नृत्य और सुआ नृत्य का सामूहिक आयोजन किया जाता है।छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख लोकपर्व है, जो दान, सामाजिक समरसता और नई फसल के उत्सव का प्रतीक है। यह पर्व प्रतिवर्ष पौष माह की पूर्णिमा (पौष पुन्नी) को मनाया जाता है; वर्ष 2026 में यह 2 जनवरी 2026 को मनाया गया।
ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
मां शाकंभरी और अन्नपूर्णा: यह पर्व पौराणिक रूप से माता शाकंभरी (अन्नपूर्णा का रूप) की पूजा से जुड़ा है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माता अन्नपूर्णा से समस्त सृष्टि के कल्याण हेतु भिक्षा मांगी थी।
फसल उत्सव: ऐतिहासिक रूप से यह कृषि आधारित पर्व है। इस समय तक किसान खेतों से धान की फसल काटकर खलिहानों से घरों में ले आते हैं। फसल घर आने की खुशी में किसान अपनी उपज का एक हिस्सा दान करते हैं।
सत्ययुग की परंपरा: बस्तर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में इसे ‘सत्ययुग की संस्कृति’ माना जाता है, जहाँ ऊंच-नीच के भेदभाव के बिना एक-दूसरे से दान मांगना सम्मान की बात मानी जाती है।
परंपराएं और सांस्कृतिक पहलू
छेरछेरा मांगना: बच्चे और युवा टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं और पारंपरिक गीत गाते हैं: “अरन बरन कोदो तरन, जब्भे डेबे तब्भे टरन, छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा”।
अन्नदान: लोग उदारतापूर्वक धान, चावल, सब्जियां या पैसे दान करते हैं। मान्यता है कि इस दिन दान करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और अहंकार का नाश होता है।
नृत्य: इस अवसर पर ग्रामीण क्षेत्रों में डंडा नृत्य और सुआ नृत्य का सामूहिक आयोजन किया जाता है।
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