रायपुर AIIMS में ली अंतिम सांस • पंडवानी की महान साधिका के निधन से देशभर में शोक • छत्तीसगढ़ ने खोई अपनी सांस्कृतिक पहचान की सबसे बुलंद आवाज़
रायपुर, 5 जुलाई। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और भारतीय कला जगत के लिए रविवार का दिन बेहद दुखद रहा। पंडवानी गायन की विश्वविख्यात लोकगायिका एवं पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित एम्स में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई। कला, साहित्य, राजनीति और सामाजिक क्षेत्र की अनेक हस्तियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इसे भारतीय लोककला की अपूरणीय क्षति बताया।
डॉ. तीजन बाई ने अपने अद्भुत गायन, प्रभावशाली अभिनय और सशक्त मंच प्रस्तुति से पंडवानी जैसी लोककला को गांवों की चौपाल से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। महाभारत की कथाओं को जिस जीवंत शैली में उन्होंने प्रस्तुत किया, उसने देश-विदेश के लाखों दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और लोकपरंपरा की सशक्त अभिव्यक्ति थी।
छत्तीसगढ़ के एक साधारण परिवार से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने का उनका सफर संघर्ष, साहस और अथक मेहनत की मिसाल रहा। सामाजिक चुनौतियों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। जिस समय पंडवानी गायन को पुरुषों तक सीमित माना जाता था, उस समय तीजन बाई ने अपनी प्रतिभा के बल पर इस परंपरा को नई दिशा दी और महिलाओं के लिए नई राह खोली।
भारतीय लोककला के संरक्षण और संवर्धन में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी उनके नाम रहे। उन्होंने अनेक देशों में भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हुए पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाई।
उनके निधन पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, विभिन्न राज्यों के राज्यपालों, जनप्रतिनिधियों तथा कला एवं संस्कृति जगत की अनेक हस्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया। सभी ने एक स्वर में कहा कि डॉ. तीजन बाई का जाना भारतीय लोकसंस्कृति के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
जीवन की प्रमुख उपलब्धियां
1 पंडवानी लोककला को विश्व स्तर पर दिलाई पहचान।
2 पद्मश्री, पद्म भूषण एवं पद्म विभूषण से सम्मानित।
3 संगीत नाटक अकादमी सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त।
4 भारतीय लोकसंस्कृति की सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि के रूप में स्थापित पहचान।
अमर रहेगी उनकी विरासत
डॉ. तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी कला और भारतीय लोकसंस्कृति के प्रति उनका समर्पण सदैव अमर रहेगा। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि प्रतिभा, संघर्ष और समर्पण के बल पर कोई भी कलाकार विश्व के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है। भारतीय लोककला का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, डॉ. तीजन बाई का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।
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