रायपुर | गुप्त खबर न्यूज़
“जिस शिक्षक के हाथ में कलम होनी चाहिए, आज उसके हाथ में तख्ती है। जिस आवाज़ से कक्षा गूंजनी चाहिए, वही आवाज़ आज विधानसभा के बाहर अपने अधिकार मांग रही है।”
यह दृश्य केवल एक आंदोलन का नहीं, बल्कि उन हजारों अतिथि शिक्षकों की पीड़ा का है जो वर्षों से प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं, लेकिन अपना भविष्य अब भी अनिश्चितता के हवाले है।
राज्य अतिथि शिक्षक (विद्यामितान) कल्याण संघ छत्तीसगढ़ के आह्वान पर आज, 16 जुलाई को हजारों अतिथि शिक्षक राजधानी रायपुर में विधानसभा घेराव के लिए जुट रहे हैं। नवा रायपुर के तूता मैदान से शुरू होने वाला यह मार्च केवल पैदल यात्रा नहीं, बल्कि उम्मीद, संघर्ष और वर्षों के इंतजार का सफर है।
विडंबना देखिए… जो शिक्षक रोज बच्चों को संविधान में लिखे अधिकार पढ़ाते हैं, आज वही अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग लेकर विधानसभा के दरवाजे पर खड़े हैं। जो बच्चों को समानता का पाठ पढ़ाते हैं, वे खुद “समान काम, समान वेतन” की लड़ाई लड़ रहे हैं।
संघ का कहना है कि दस वर्षों से अधिक समय से अतिथि शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं। दूर-दराज़ के गांवों से लेकर शहरों तक उन्होंने स्कूलों को संभाला, परिणाम दिए और शिक्षा का स्तर बनाए रखा। लेकिन जब सम्मान, सुरक्षा और स्थायी रोजगार की बात आई, तो हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला।
मांगें वही… इंतजार भी वही
अतिथि शिक्षकों की प्रमुख मांगों में संविलियन एवं नियमितीकरण, समान कार्य के लिए समान वेतन, स्थायी सेवा नीति, और सेवा सुरक्षा शामिल हैं। उनका कहना है कि वे किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे, बल्कि अपने श्रम का उचित सम्मान चाहते हैं।
आंदोलन के पोस्टरों पर लिखी पंक्तियां बहुत कुछ कह जाती हैं— “हम पढ़ाते हैं, भविष्य बनाते हैं… हमें अधिकार चाहिए, उपकार नहीं।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की पीड़ा का सार है।
सवाल व्यवस्था से भी…
शिक्षकों का सवाल है कि जब उनसे नियमित शिक्षकों की तरह काम लिया जाता है, तो अधिकार और वेतन में इतना बड़ा अंतर क्यों? वर्षों तक सेवा देने के बाद भी हर नए सत्र में रोजगार की अनिश्चितता क्यों बनी रहती है? क्या शिक्षा व्यवस्था केवल अस्थायी भरोसे पर चल सकती है?
राजधानी में सुरक्षा के कड़े इंतजाम
विधानसभा घेराव को देखते हुए रायपुर और नवा रायपुर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है और यातायात व्यवस्था में भी बदलाव किए गए हैं। प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील की है।
अब निगाहें सरकार पर हैं। क्या इस बार भी अतिथि शिक्षकों को केवल आश्वासन मिलेगा, या वर्षों से लंबित मांगों पर कोई ठोस निर्णय लिया जाएगा?
एक बात तय है—आज सड़कों पर उतरे ये शिक्षक सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उस सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो हर उस व्यक्ति को मिलना चाहिए जिसने आने वाली पीढ़ियों को शिक्षित करने का दायित्व निभाया है।
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