क्या रायगढ़ की ‘केलो नदी’ को जहरीला बनाने वालों को अब नए प्लांट का इनाम?
रायगढ़ की जीवनदायिनी कही जाने वाली केलो नदी को प्रदूषण के दलदल में धकेलने वाले औद्योगिक घरानों पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पूर्वांचल क्षेत्र में यह चर्चा तेज हो गई है कि जिन कंपनियों पर पर्यावरण नियमों की अनदेखी और प्रदूषण फैलाने के आरोप लगते रहे हैं, क्या उन्हें अब नए और विशाल औद्योगिक प्रोजेक्ट्स का “इनाम” दिया जा रहा है?
इसी बीच सिंघल स्टील प्राइवेट लिमिटेड द्वारा ग्राम पतरापाली (पूर्व), कोतरलिया और सियारपाली में 17 लाख टन क्षमता का “ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट” स्थापित करने की तैयारी ने ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों की चिंता बढ़ा दी है। इस परियोजना के लिए छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (CECB) ने 6 जुलाई 2026 को जनसुनवाई निर्धारित की है।
एनजीटी और सरकारी रिपोर्टों में सामने आई कमियां
सिंघल एंटरप्राइजेज पहले भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की जांच के दायरे में रह चुकी है। O.A. No. 55/2021 में प्रस्तुत CPCB-CECB संयुक्त समिति की रिपोर्ट में कई गंभीर विसंगतियां सामने आई थीं।
जमीन के दावों में गड़बड़ी
कंपनी ने लगभग 137 हेक्टेयर भूमि अपने स्वामित्व में होने का दावा किया था, लेकिन जांच में यह दावा गलत पाया गया। रिपोर्ट के अनुसार केवल लगभग 74.836 हेक्टेयर भूमि ही सीधे कंपनी के नाम पर पाई गई, जबकि शेष भूमि अन्य लोगों के स्वामित्व में थी।
भूजल प्रदूषण की आशंका
संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में कंपनी को बॉटम ऐश स्टोरेज क्षेत्र के आसपास भूजल की विस्तृत जांच कराने की सिफारिश की थी। यह संकेत देता है कि राख भंडारण से जल स्रोतों के प्रदूषित होने की आशंका को गंभीर माना गया।
33 प्रतिशत ग्रीन बेल्ट का पालन नहीं
जांच में यह भी पाया गया कि पर्यावरण स्वीकृति की अनिवार्य शर्तों के तहत 33 प्रतिशत हरित पट्टी विकसित नहीं की गई थी। इस मामले में ट्रिब्यूनल को निर्देश जारी करने पड़े थे।
जांच के दौरान ‘साफ’ उत्सर्जन, लेकिन प्लांट में गंदगी
27-28 अगस्त 2021 को जब संयुक्त समिति ने निरीक्षण किया, तब उत्सर्जन स्तर मानकों के भीतर दर्ज किया गया। लेकिन रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट उल्लेख किया गया कि प्लांट परिसर की हाउसकीपिंग “बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं” थी।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि स्पंज आयरन और कोल आधारित उद्योगों में जांच से पहले प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों को पूर्ण क्षमता पर चलाने की प्रवृत्ति आम है। हालांकि लंबे समय से जमा कोयले की धूल और राख की परतें वास्तविक स्थिति को उजागर कर देती हैं।
अब सवाल उठ रहा है कि जो कंपनी अपने प्लांट परिसर के भीतर स्थायी स्वच्छता और पर्यावरणीय अनुशासन सुनिश्चित नहीं कर सकी, क्या वह बाहरी कृषि भूमि, गांवों और जलस्रोतों की सुरक्षा कर पाएगी?
केलो नदी को लेकर पहले भी उठे थे सवाल
तराईमाल स्थित कंपनी के पुराने प्लांट की जनसुनवाई संबंधी सरकारी दस्तावेजों में ग्रामीणों की आपत्तियां दर्ज हैं। ग्रामीणों ने आशंका जताई थी कि उद्योग का दूषित पानी केलो नदी में छोड़ा जाएगा और कोयला आधारित गतिविधियों से निकलने वाले मर्क्युरी जैसे तत्व हवा और पानी को प्रभावित करेंगे।
कंपनी के दस्तावेजों में जल स्रोत के रूप में “छुईकंसा नाला” का उल्लेख है, जो केलो नदी की सहायक जलधारा मानी जाती है। इससे स्थानीय लोगों की चिंता और बढ़ गई है।
पहले से प्रदूषित रायगढ़ पर नया दबाव
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्टों में रायगढ़ को पहले ही गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों में शामिल किया जा चुका है। क्षेत्र में पीएम-10 स्तर मानकों से कई गुना अधिक दर्ज किए जाने की बात सामने आती रही है।
अब प्रस्तावित परियोजना में—
17 लाख टन टीपीए स्टील यूनिट
12 लाख टन टीपीए पेलेट प्लांट
6 लाख टन टीपीए कोल वाशरी
160 मेगावॉट कैप्टिव पावर प्लांट
जैसी बड़ी इकाइयां शामिल हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र में पहले से संचालित सैकड़ों उद्योगों के प्रदूषण ने खेती-किसानी को प्रभावित किया है। उनका कहना है कि यदि यह नया मेगा प्रोजेक्ट शुरू होता है, तो पतरापाली, कोतरलिया और आसपास के गांवों की धान, सब्जी और महुआ आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अब सबकी नजर 6 जुलाई की जनसुनवाई पर टिकी है, जहां यह तय होगा कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन किस दिशा में जाएगा।
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