पत्थलगांव। गुरु केवल एक शब्द नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, मार्गदर्शन और जीवन के प्रकाश का प्रतीक हैं। गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण की इसी पवित्र भावना को शब्दों में पिरोते हुए डॉ. जगबंधु राम यादव ‘अध्यात्म कलमकार’, सुरंग पानी, पत्थलगांव ने अपनी भावपूर्ण रचना “गुरु देव के चरणों में शब्द पुष्प” के माध्यम से गुरु महिमा का सुंदर और आध्यात्मिक चित्रण किया है।
रचना की शुरुआत ही गुरु के प्रति गहरी आस्था और आत्मिक अनुभूति से होती है—
“अन्तःकरण में गुरु स्वयं ही,
जीवन पथ आलोकित करते।
गुरु कहूं या स्वयं ज्ञान पुंज,
ज्यों पर्याय बनकर विचरते।।“
कवि ने गुरु को ज्ञान का ऐसा प्रकाश बताया है, जो मनुष्य के जीवन से अज्ञान का अंधकार दूर कर उसे सही दिशा प्रदान करता है। गुरु की महिमा को ब्रह्मकमल, पारस, गंगाजल और सुधा जैसे उपमानों से भी ऊपर रखते हुए रचनाकार यह भाव व्यक्त करते हैं कि गुरु के व्यक्तित्व और महत्ता का पूर्ण वर्णन किसी भी उपमा से संभव नहीं है।
अंधकार में दीप बनकर राह दिखाते हैं गुरु
रचना के अगले चरण में गुरु के संघर्षशील और करुणामयी स्वरूप को सामने रखा गया है। कवि लिखते हैं—
“गहन तमस में आप दीप बन,
नित्य जला करते गुरुवर जी।”
इन पंक्तियों में गुरु को उस दीपक के रूप में देखा गया है, जो स्वयं कठिनाइयों का सामना करते हुए शिष्य के जीवन को प्रकाश देता है। स्नेह, अनुशासन और मार्गदर्शन के माध्यम से गुरु जीवन को उन्नति की ओर ले जाते हैं।
गुरु—ज्ञान, संस्कार और जीवन का आधार
रचना में गुरु को जीवन की मजबूत नींव के रूप में चित्रित किया गया है। कवि के अनुसार गुरु का स्नेह और मार्गदर्शन व्यक्ति के व्यक्तित्व को मजबूत बनाता है। गुरु कभी कठोर होकर अनुशासन सिखाते हैं तो कभी मृदुल बनकर कठिन परिस्थितियों में सहारा देते हैं।
रचना की यह पंक्तियां गुरु के इसी विराट स्वरूप को रेखांकित करती हैं—
“कभी कड़क हो, कभी मृदुल बन,
विपदाओं को हर लेते हैं।।“
गुरु की महिमा को बताया देवों से भी बढ़कर
रचनाकार ने गुरु को अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ नमन करते हुए उनकी महिमा को सर्वोच्च स्थान दिया है—
“पूजित और प्रणम्य हैं गुरुवर,
उनकी अद्भुत महिमा है।
तीनों देवों से बढ़कर के,
गुरु की गौरव गरिमा है।।“
इन पंक्तियों में गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति भारतीय संस्कृति की गहरी आस्था और सम्मान स्पष्ट दिखाई देता है।
अंतिम पंक्तियों में समर्पण का भाव
रचना का समापन गुरु चरणों में पूर्ण समर्पण की भावना के साथ होता है—
“हे गुरुजी! तुम कल्पवृक्ष हो,
मुझे जगह दो निज पर्णों में।
जगबंधु कर रहा वंदना,
आपके पवित्र श्री चरणों में।।“
यह रचना केवल गुरु की प्रशंसा नहीं, बल्कि गुरु के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और आत्मिक समर्पण की सुंदर अभिव्यक्ति है। सरल शब्दों में गहरे आध्यात्मिक भावों को प्रस्तुत करती यह रचना पाठकों को गुरु के महत्व पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
✍️ रचनाकार परिचय
डॉ. जगबंधु राम यादव
अध्यात्म कलमकार
📍 सुरंग पानी, पत्थलगांव
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
*गुरु देव के चरणों में शब्द पुष्प*
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अन्त:करण में गुरु स्वयं ही,
जीवन पथ आलोकित करते।
गुरु कहूं या स्वयं ज्ञान पुंज,
ज्यों पर्याय बनकर विचरते ।।
ब्रम्ह कमल या पारस कहना,
गुरुवर का उपमान गौण है।
गंगाजल या सुधा कहें तो,
लज्जा से उपमान मौन है।।१।।
***
गहन तमस में आप दीप बन
नित्य जला करते गुरुवर जी।
कष्ट कंटकों बाधाओं से,
सदा भला ला करते गुरुवर जी।।
स्नेह मेघ वर्षाकर गुरवर,
उन्नतशील जीवन देते हैं।
कभी कड़क हो , कभी मृदुल बन,
विपदाओं को हर लेते हैं।।२।।
***
जर्जर घर में साबूत ईंट,
के जैसे गुरु जी मानस में ।
पतझड़ के तरुओं के जैसे,
गुरुवर जीते हैं पावस में।।
पूजित और प्रणम्य है गुरुवर,
उनकी अद्भुत महिमा है ।
तीनों देवों से बढ़कर के,
गुरु की गौरव गरिमा है ।।३।।
***
हे गुरुजी तुम कल्प वृक्ष हो,
मुझे जगह दो निज पर्णों में।
जगबंधु कर रहा वंदना,
आपके पवित्र श्री चरणों में।।४।।
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