रायपुर, 7 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ की माटी की सौंधी खुशबू, लोकजीवन की सहज संवेदनाएं और पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध लोकपरंपराओं के रंगों से ‘लोकरंग पर्व’ का दूसरा दिन पूरी तरह सराबोर रहा। मुक्ताकाशी मंच पर सजे सांस्कृतिक कार्यक्रम में ‘लोरिक चंदा’, ददरिया और चंदैनी जैसी पारंपरिक लोकविधाओं की मनमोहक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ दिया।
लोकसंगीत की मधुर धुनों, पारंपरिक गायन शैली और कलाकारों की सजीव प्रस्तुतियों ने ऐसा वातावरण निर्मित किया, मानो छत्तीसगढ़ का ग्रामीण लोकजीवन स्वयं मंच पर उतर आया हो।
‘लोरिक चंदा’ ने बांधा भावनाओं का सेतु
कार्यक्रम का आगाज प्रदेश की लोकप्रिय लोकगाथा ‘लोरिक चंदा’ के भावपूर्ण प्रसंग से हुआ। श्री व्यासनाथ योगी एवं साथियों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से लोकगाथा की कथात्मकता, भावनात्मक गहराई और पारंपरिक गायन शैली को मंच पर जीवंत कर दिया।
लोकवाद्यों की संगत और पारंपरिक सुरों के बीच प्रस्तुत लोकगाथा ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ की उस सांस्कृतिक दुनिया से रूबरू कराया, जहां लोककथाएं केवल मनोरंजन नहीं बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों और जीवन मूल्यों की संवाहक रही हैं।
ददरिया की मिठास ने मोहा मन
इसके बाद श्री विजय साहू एवं साथियों ने ददरिया की मनमोहक प्रस्तुति दी। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में गहराई से रची-बसी ददरिया की मधुर धुनों ने मुक्ताकाशी मंच को भावनाओं और संगीत से भर दिया।
ददरिया के सुरों में ग्रामीण जीवन की सहजता, प्रेम की कोमलता और लोकमन की आत्मीयता का ऐसा संगम देखने को मिला कि दर्शक देर तक तालियों से कलाकारों का उत्साह बढ़ाते रहे।
चंदैनी के सुरों में घुला प्रेम और लोकजीवन
वहीं श्री बरसन देशलहरे ने चंदैनी के माध्यम से प्रेम, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं को सुरों में पिरोया। उनकी प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जीवनशैली, लोकभावनाओं और सामाजिक सरोकारों की सहज एवं प्रभावशाली झलक दिखाई दी।
लोककलाओं का संरक्षण समय की जरूरत : डॉ. संजय कन्नौजे
कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने लोककलाओं के संरक्षण और कलाकारों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि स्थानीय मंच छत्तीसगढ़ की लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने और प्रोत्साहन प्राप्त करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। ऐसे आयोजन केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं।
उन्होंने कहा कि लोरिक चंदा, चंदैनी गीत और ददरिया जैसी लोकविधाएं छत्तीसगढ़ के लोकजीवन की पहचान हैं। इनका संरक्षण और मंचन युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ‘लोकरंग पर्व’ इसी सांस्कृतिक उद्देश्य को आगे बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण पहल है।
सांस्कृतिक और साहित्यिक जगत की हस्तियां रहीं मौजूद
कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, पूर्व संचालक श्री अनिल कुमार साहू, उपसंचालक श्री उमेश मिश्रा, छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार श्री दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार श्री विजय मिश्रा तथा समाजसेवी श्री उदयभान चौहान विशेष रूप से उपस्थित रहे।
लोकविधाओं को एक मंच पर ला रहा ‘लोकरंग पर्व’
‘लोकरंग पर्व’ छत्तीसगढ़ की लोकगाथाओं, लोकगीतों, लोकसंगीत और पारंपरिक लोकनृत्यों को एक साझा मंच उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आ रहा है।
आयोजन के दूसरे दिन की प्रस्तुतियों ने यह संदेश भी दिया कि आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजना और लोकपरंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।
मुक्ताकाशी मंच पर गूंजते लोकसुर, पारंपरिक वाद्यों की थाप और कलाकारों की सजीव प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को छत्तीसगढ़ की संस्कृति के रंग में रंग दिया। लोरिक चंदा की कथा, ददरिया की मिठास और चंदैनी के भावपूर्ण सुरों ने ‘लोकरंग पर्व’ के दूसरे दिन को एक अविस्मरणीय सांस्कृतिक शाम में बदल दिया।
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